दिल्ली में चुनावी माहौल धीरे-धीरे गरमा रहा है। कल भाजपा की चुनावी सभा दिख गई तो अपने आप कदम उधर ही बढ़ चले। वक्ता आग उगल रहे थे (सुप्रीम कोर्ट के डर से वरुण जितनी नहीं) लेकिन मेरी तो हर बात पर हंसी छूट रही थी। चलिए आपको भी बताता हूं वहां का आंखों देखा हाल...
मंच पर 7-8 सज्जन विराजमान थे। संयोग से कोई भी 80-90 किलो से कम का नहीं था बल्कि कई तो सैकड़ा पार करने का दम रखते थे। जिस समय मैं पहुंचा एक सरदारजी मंच पर वीररस की कविता दहाड़... मेरा मतलब है सुना रहे थे। लगता था फुटपाथ पर बिकने वाली सस्ती शायरी की किताबों से तुकबन्दियां चुरा कर लाये थे। उन्हें रामसेतू से बड़ा लगाव था, बात-बात पर रामसेतू का राग अलाप देते थे। इतनी कर्कश आवाज में चीख रहे थे कि लगता था कि हिन्दुओं पर होने वाले सारे अत्याचार का गुस्सा आज बेचारे माईक पर उतारे दे रहे हैं। उन्हें इसका भी काफी कष्ट था कि लोगों ने राम के अस्तित्व पर ही सवाल खड़ा कर दिया। इसके लिए करुणानिधि जी की बायीं आंख पर भी व्यंग्य करने से नहीं चूके। राम के अस्तित्व पर सवाल के जवाब में उन्होंने जो तर्क दिया उससे बड़े-बड़े नृतत्वशास्त्री भी चारो खाने चित्त हो सकते हैं। उन्होंने अपनी कविता में कहा कि आदमी के बाप का नाम भी तो माथे पर नहीं लिखा होता लेकिन वो किसी को तो अपना बाप कहता ही है ना, फिर राम के होने का सबूत क्यों मांगा जा रहा है। वाह-वाह क्या बात है, मेरी हंसी सुनकर आसपास के लोग मुझे गौर से देखने लगे। इस तर्क पर इस इलाके के लोकसभा प्रत्याशी ने खूब देर तक तालियां बजाईं। जय हो...
इसके बाद कई लोगों ने बात रखी जिसमें यही बात दोहराई गई कि देश को आगे बढ़ाना है, हिन्दुओं का खोया मान-सम्मान वापस लौटाना है, राष्ट्रवाद बढ़ाना है। उम्मीदवार को इलाके के दुकानदारों ने काफी पैसा इकट्ठा करके दिया। लेकिन राष्ट्रवाद और हिन्दुत्व के बीच में एक बनिये ने इस सभा का असली मकसद यानी एजेण्डा एकदम साफ-साफ रख दिया। वह बोला भईया देखो बाकी तो सब बात ठीक है लेकिन सारी चीजें चलती हैं रोजी-रोटी से। हमारी रोजी-रोटी है दुकान। अब मार्केट में लाईट नहीं आएगी, पानी नहीं आएगा, दफ्तरों और थानों में हमारी बात नहीं सुनी जाएगी तो फिर क्या फायदा है किसी के जीतने का? अब तो उम्मीदवार बिछ गये (नोटों की गड्डियां जो मिली थीं) कि आधी रात को आप लोगों की सेवा में हाजिर रहूंगा। इसके बाद नारेबाजी थोड़ी ही हुई(चूंकि नारे लगवाने वाले सज्जन अपनी तोंद से खासे परेशान दिख रहे थे) लिहाजा हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद बचाने के आह्वान के साथ सभा जल्दी से समाप्त कर दी गयी।
Saturday, April 18, 2009
Tuesday, April 14, 2009
अरे भई ऐसे कैसे होगी संस्कृति की रक्षा।
कर्नाटक के ''लौह'' गृहमंत्री हैं वी.एस. आचार्य। मैंगलौर पब हमले पर संस्कृति की रक्षा पर काफी दहाड़ लगायी थी। लेकिन कल एक कार्यक्रम में सर पर पांव रखकर ऐसा भागे कि लोगों को सिर्फ धूल उड़ती दिखाई दी। धूल बैठी तो मंत्रीजी गायब। बेचारे उनके सुरक्षाकर्मी भी हैरान-परेशान। बाद में उस सभा के आयोजकों ने उन्हें वाहन में बैठाकर मंत्रीजी तक पहुंचाया।
दरअसल चुनावों की मारामारी में एसी कक्षों के आदी नेता पहले ही काफी परेशान हैं। इसी हालत में आचार्यजी भाजपा कार्यकर्ताओं की बैठक को संबोधित करने निकले तो रास्ते में कांग्रेस कार्यकर्ताओं की बैठक को गलती से अपनी बैठक समझ बैठे। खैर कांग्रेस वालों ने आदर-सत्कार किया, पानी पिलाया, कुर्सी दी। फिर मंत्रीजी ने अपना राग अलापना शुरू किया। अपनी उपलब्धियां गिनाने लगे तो कांग्रेसी धैर्यपूर्वक सुनते रहे, लेकिन जब कांग्रेस की बखिया उधेड़ने लगे तो कांग्रेसियों का भी आदिम गुंडा खून खौल गया। उसके बाद तो मंत्रीजी हक्के-बक्के। कुछ न सूझा तो बस सरपट भाग चले। कर्नाटक के नौजवान लड़के-लड़कियों और अल्पसंख्यकों के खिलाफ आग उगलने वाले माननीय गृहमंत्रीजी ऐसा भागे कि अपने सुरक्षाकर्मियों तक को छोड़ गये। गृहमंत्री अपनी सेनाओं और दलों की फौज से इक्का-दुक्का नौजवानों को तो धमका सकते हैं पर अपने बराबर के गुंडों के सामने एक सेकेंड भी नहीं टिक पाये। अरे भई ऐसे कैसे होगी संस्कृति की रक्षा।
दरअसल चुनावों की मारामारी में एसी कक्षों के आदी नेता पहले ही काफी परेशान हैं। इसी हालत में आचार्यजी भाजपा कार्यकर्ताओं की बैठक को संबोधित करने निकले तो रास्ते में कांग्रेस कार्यकर्ताओं की बैठक को गलती से अपनी बैठक समझ बैठे। खैर कांग्रेस वालों ने आदर-सत्कार किया, पानी पिलाया, कुर्सी दी। फिर मंत्रीजी ने अपना राग अलापना शुरू किया। अपनी उपलब्धियां गिनाने लगे तो कांग्रेसी धैर्यपूर्वक सुनते रहे, लेकिन जब कांग्रेस की बखिया उधेड़ने लगे तो कांग्रेसियों का भी आदिम गुंडा खून खौल गया। उसके बाद तो मंत्रीजी हक्के-बक्के। कुछ न सूझा तो बस सरपट भाग चले। कर्नाटक के नौजवान लड़के-लड़कियों और अल्पसंख्यकों के खिलाफ आग उगलने वाले माननीय गृहमंत्रीजी ऐसा भागे कि अपने सुरक्षाकर्मियों तक को छोड़ गये। गृहमंत्री अपनी सेनाओं और दलों की फौज से इक्का-दुक्का नौजवानों को तो धमका सकते हैं पर अपने बराबर के गुंडों के सामने एक सेकेंड भी नहीं टिक पाये। अरे भई ऐसे कैसे होगी संस्कृति की रक्षा।
Wednesday, April 1, 2009
विश्व के शीर्ष नेताओं ने गूगल से ब्लॉगर सेवा को बंद करने का अनुरोध किया
इंग्लैंड में जुटे दुनिया के शीर्ष जी-20 देशों के नेताओं ने पहले दिन एक स्वर से गूगल की ब्लॉगर सेवा बंद करने पर सहमति जतायी। पता चला है कि पहले ही दिन की बैठक में अचानक यह मसला बातचीत के केंद्र में आ गया। चीन ने सबसे पहले इस मुद्दे को उठाते हुए कहा कि ब्लॉग लेखन के जरिए उसके देश में दुष्प्रचार (मानवाधिकारों के हनन का) किया जा रहा है। इससे सरकार के कामकाज और उसकी आलोचना भी लोगों के बीच तेजी से फैलती जा रही है। ब्राजील के राष्ट्रपति ने कहा कि उनके देश में बेरोजगारों ने ब्लॉग के जरिए सरकार विरोधी अभियान चला रखा है। भारत के प्रधानमंत्री ने भी इस मसले पर सहमति जताते हुए कहा कि उनके यहां राजनीतिक विरोधियों (जैसे छत्तीसगढ़ में एक डॉक्टर आदि) को जेल में ठूंसने के खिलाफ ब्लॉग के जरिए प्रचार किया गया। साथ ही नेताओं, मीडिया संस्थानों/दिग्गजों, राजनीतिक पार्टियों के खिलाफ ब्लॉग पर जमकर लिखा और पढ़ा जा रहा है। उन्होंने भारत के शीर्ष हिन्दी अखबार की महिला संपादक समेत न्यायपालिका के शीर्ष निकायों द्वारा हाल ही में ब्लॉग के बढ़ते खतरे की चिंताओं का जिक्र भी किया। तुर्की के राष्ट्रपति ने कहा कि कई देशों में ब्लॉगरों ने ईशनिंदा या धार्मिक कट्टरता के खिलाफ बोलने के लिए ही ब्लॉग का सहारा लिया। लगभग सभी देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने एक स्वर में चिंता जताई कि ब्लॉग के जरिए बिना कोई पैसा खर्च किए आम लोगों को अपनी बात रखने का औजार दे देना चिंतनीय बात है। इससे लोगों को सरकार, नेताओं, अधिकारियों, पार्टियों, धार्मिक नेताओं (और धर्म पर टिकी चुनावी पार्टियों) के खिलाफ अपनी आवाज उठाने का मौका मिलेगा जो मौजूदा वर्ल्ड सोशल आर्डर (विश्व सामाजिक व्यवस्था) के लिए सही नहीं है। सबसे अंत में ओबामा ने इस पूरे मुद्दे को अमेरिका का पुरजोर समर्थन देते हुए कहा कि ब्लॉग ने अमेरिकी प्रशासन के लिए भी मुसीबत खड़ी की हैं। उन्होंने कुछ दिन पहले की घटना का जिक्र करते हुए कहा कि बुश पर इराक में जूता फेंकने की घटना ब्लॉग के जरिए ही चंद मिनटों में दुनिया भर में पहुंच गई थी। उन्होंने कहा कि अमेरिका इराक की भांति दुनिया भर में लोकतंत्र स्थापित करने के अपने मिशन में जुटा रहेगा, इसलिए ऐसी घटनाएं भविष्य में हो सकती हैं। इसलिए जरूरी है कि अब ऐसे संचार साधनों पर लगाम कसी जाए जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर कुछ भी दिखा देने को आजाद हैं। उन्होंने कहा कि वे जी-20 के नेताओं की भावना से गूगल कंपनी को वाकिफ कराएंगे और उनसे ब्लॉगर सेवा तत्काल बंद करने को कहेंगे।
Sunday, February 8, 2009
हमारा....से कोई संबंध नहीं है
बड़ी सांसत है आजकल धर्म के रक्षकों की। धर्म और संस्कृति की रक्षा भी करनी है और पुरातनपंथी होने की छवि भी नहीं बनने देनी है। आजकल नये-नये नामों से संगठन खड़े करके बिगड़े लोगों को रास्ते पर लाने का फार्मूला निकाला है। पूरी कोशिश की जाती है कि नये संगठनों के कारनामों (गुण्डागर्दी) से नाम तो न खराब हो अलबत्ता चुनावों में फायदा जरूर हो। लेकिन क्या करें तब भी लोग समझ ही जाते हैं। अब देखिये कर्नाटक में अंदरूनी तौर पर बकायदा कामों का बंटवारा किया था कि इसमें धर्मांतरण के खिलाफ बजरंग दल काम करेगा तो श्रीराम सेना संस्कृति की रक्षा करेगी। लेकिन जनता है कि सबको घालेमेल किये दे रही है। मना करते-करते बेचारों की जबान सूख गई कि भैया, श्रीराम सेना से हमारा कोई संबंध नहीं है। लेकिन जनता भी अड़ ही गई है कि नहीं विचारधारा तो आपकी ही लागू कर रहे हैं। इसी तरह के मामले में इस बार तहलका हिन्दी में राजीव प्रताप रुडी ने कहा कि हमारा ऐसे तत्वों से कोई रिश्ता नहीं है और दिल्ली विश्वविद्यालय में एसएआर गिलानी पर थूकने वाले भी विद्यार्थी परिषद के लोग नहीं थे। गजब राजीव भैया, सारे अखबारों में 7, 8, 9 नवंबर 2008 को इस घटना की खबरें छपीं थीं, सबको झूठा साबित कर दिये हो। उस समय थूकने वालों को आपने तड़ से देशभक्त बता दिया था। अगर वे विद्यार्थी परिषद के नहीं थे तो डूसू अध्यक्ष नूपूर शर्मा उनकी पैरवी में क्यों आई थीं। फिर एवीबीपी के 20 कार्यकर्ताओं समेत उसको पुलिस ने क्यों पकड़ा था?
पर आपकी दिक्कत जायज है। भैया दो-दो काम एक साथ करने पड़ रहे हैं। अब जहां ज्यादा हल्ला मचे, बस वहीं अपनी पार्टी का कोई संबंध न होने का कहते जाना होगा। ध्यान रखिएगा, अब कहीं बार-बार ये कहते-कहते गुंडागर्दी की हर घटना पर सफाई मत देते जाइएगा...
पर आपकी दिक्कत जायज है। भैया दो-दो काम एक साथ करने पड़ रहे हैं। अब जहां ज्यादा हल्ला मचे, बस वहीं अपनी पार्टी का कोई संबंध न होने का कहते जाना होगा। ध्यान रखिएगा, अब कहीं बार-बार ये कहते-कहते गुंडागर्दी की हर घटना पर सफाई मत देते जाइएगा...
Thursday, January 1, 2009
नया वर्ष जीवन, संघर्ष और सृजन के नाम!!!
नया वर्ष
नयी यात्रा के लिए उठे
पहले कदम के नाम,
सृजन की नयी परियोजनाओं के नाम,
बीजों और अंकुरों के नाम,
कोंपलों और फुनगियों के नाम
उड़ने को आतुर शिशु पंखों के नाम
नया वर्ष तूफानों का आह्वान करते
नौजवान दिलों के नाम
जो भूले नहीं हैं
प्यार करना
उनके नाम जो भूले नहीं हैं
सपने देखना,
संकल्पों के नाम
जीवन, संघर्ष और सृजन के नाम!!!
नववर्ष की आप सभी को बहुत-बहुत बधाई। ये पंक्तियां मेरी नहीं हैं लेकिन मुझे काफी अच्छी लगती हैं।
नयी यात्रा के लिए उठे
पहले कदम के नाम,
सृजन की नयी परियोजनाओं के नाम,
बीजों और अंकुरों के नाम,
कोंपलों और फुनगियों के नाम
उड़ने को आतुर शिशु पंखों के नाम
नया वर्ष तूफानों का आह्वान करते
नौजवान दिलों के नाम
जो भूले नहीं हैं
प्यार करना
उनके नाम जो भूले नहीं हैं
सपने देखना,
संकल्पों के नाम
जीवन, संघर्ष और सृजन के नाम!!!
नववर्ष की आप सभी को बहुत-बहुत बधाई। ये पंक्तियां मेरी नहीं हैं लेकिन मुझे काफी अच्छी लगती हैं।
Tuesday, December 16, 2008
जूता खाने के बाद बुश का एक्सक्लूजिव इंटरव्यू
पत्रकार- सुना है आप पर जूता फैंका गया है?
बुश - देखिए, मैं अमेरिका का राष्ट्रपति हूं। दुनिया के सबसे बेशर्म-कमीने-गलीज़ अपराधियों का सरगना। मुझे इन छोटी-मोटी बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता।
पत्रकार - लेकिन फिर भी क्या यह आपके लिए शर्मनाक घटना नहीं है? बुश - अगर शर्म ही करनी होती तो मैं राजनीति में ही क्यों आता और वैसे भी मैंने इतना झूठ बोला है, इराक-अफगानिस्तान-फिलीस्तीन से लेकर दुनिया के हर हिस्से में इतने नरसंहार करवाये हैं कि मेरे सामने तो शर्म भी आकर शर्म से डूब मरे। पत्रकार - आप पर जूता क्यों फेंका गया? बुश - लोकतंत्र की वजह से। देखिये मुक्त समाजों में ही ऐसा संभव है। इससे साबित होता है कि इराक में लोकतंत्र जड़ें जमा चुका है। पत्रकार - क्या आपको डर नहीं लग रहा? बुश - (ऑफ द रिकार्ड) सच बताऊं, डर के मारे तो मेरी हालत खराब है लेकिन क्या करुं। ये सीट ही ऐसी है, जी कड़ा करके, नॉर्मल दिखने की कोशिश कर रहा हूं।
पत्रकार - आखिरी सवाल, इस घटना का अमेरिका पर क्या असर पड़ेगा? बुश - देखिये आजकल पूरी दुनिया में मंदी चल रही है। हमारे देश में सबसे ज्यादा हालत पतली है। मैंने इन सड़े जूतों को संभाल कर अपने पास रख लिया है। मैं इन्हें अमेरिका ले जाकर फुटवियर उद्योग को बेलआऊट पैकेज में दे दूंगा। हमारी अर्थव्यवस्था में इनसे थोड़ा सुधार जरूर आएगा। (नोट : यह पत्रकार बिना जूतों के ठंड में कांपते हुए इंटरव्यू ले रहा था)
बुश - देखिए, मैं अमेरिका का राष्ट्रपति हूं। दुनिया के सबसे बेशर्म-कमीने-गलीज़ अपराधियों का सरगना। मुझे इन छोटी-मोटी बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता।
पत्रकार - लेकिन फिर भी क्या यह आपके लिए शर्मनाक घटना नहीं है? बुश - अगर शर्म ही करनी होती तो मैं राजनीति में ही क्यों आता और वैसे भी मैंने इतना झूठ बोला है, इराक-अफगानिस्तान-फिलीस्तीन से लेकर दुनिया के हर हिस्से में इतने नरसंहार करवाये हैं कि मेरे सामने तो शर्म भी आकर शर्म से डूब मरे। पत्रकार - आप पर जूता क्यों फेंका गया? बुश - लोकतंत्र की वजह से। देखिये मुक्त समाजों में ही ऐसा संभव है। इससे साबित होता है कि इराक में लोकतंत्र जड़ें जमा चुका है। पत्रकार - क्या आपको डर नहीं लग रहा? बुश - (ऑफ द रिकार्ड) सच बताऊं, डर के मारे तो मेरी हालत खराब है लेकिन क्या करुं। ये सीट ही ऐसी है, जी कड़ा करके, नॉर्मल दिखने की कोशिश कर रहा हूं।
पत्रकार - आखिरी सवाल, इस घटना का अमेरिका पर क्या असर पड़ेगा? बुश - देखिये आजकल पूरी दुनिया में मंदी चल रही है। हमारे देश में सबसे ज्यादा हालत पतली है। मैंने इन सड़े जूतों को संभाल कर अपने पास रख लिया है। मैं इन्हें अमेरिका ले जाकर फुटवियर उद्योग को बेलआऊट पैकेज में दे दूंगा। हमारी अर्थव्यवस्था में इनसे थोड़ा सुधार जरूर आएगा। (नोट : यह पत्रकार बिना जूतों के ठंड में कांपते हुए इंटरव्यू ले रहा था)
Tuesday, November 18, 2008
ओबामा की असलियत और बनाई जा रही छवि
आजकल एक बुखार पूरी दुनिया में चल रहा है। ओबामा वायरल। पूरी दुनिया में अमेरिका के नये राष्ट्रपति को बदलाव के नये मसीहा के रूप में दिखाने की कोशिश की जा रही है। कोई उन्हें दलितों-पिछड़ों का विश्व प्रतिनिधि बता रहा है तो कोई 'समाजवादी' विचारों वाला प्रगतिशील नेता। मीडिया से लेकर प्रबुद्ध तबका भी गदगद है। हालांकि असलियत कुछ और है। ओबामा की लोकप्रियता की एक वजह उनका अश्वेत होना है। जबकि अमेरिका के अश्वेत आंदोलन यानी मार्टिन लूथर किंग की विरासत से उनका कोई लेना-देना कभी नहीं रहा। उन्होंने अश्वेतों के किसी आंदोलन को समर्थन या उसमें शिरकत नहीं की। बहुत लोगों को हैरानी होगी लेकिन आजकल अपने बयानों से एकदम उलट ओबामा ने अमेरिकी सीनेट में कभी किसी भी युद्ध प्रस्ताव का विरोध नहीं किया। 2002 के कुख्यात पेट्रियट एक्ट 2 के मुखर समर्थक भी वे थे। उन्होंने इरान के राष्ट्रपति अहमदीनेजाद के संयुक्त राष्ट्र संघ को संबोधित करने का काफी विरोध प्रकट किया था। इस चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने अपने स्टाफ को किसी मुस्लिम वेशभूषा से बचने का सख्त आदेश दिया था। ओबामा अफगानिस्तान में युद्ध में तेजी और पाकिस्तान पर हमलों के हिमायती हैं। मक्कैन के चुनाव खर्चे के 2600 अंशदानकर्ता सीईओ थे जबकि ओबामा के 6,000। ओबामा को वाशिंगटन की ताकतवर लॉबी, संचार, इलेक्ट्रानिक, हेल्थकेयर, न्यूक्लियर और दवा उद्योग ने भारी पैसा देकर जिताया है। जाहिर है इसकी कीमत भविष्य में वसूली जाएगी। ओबामा के बारे में और भी कई तथ्य आज के हिन्दू में एजाज अहमद साहब के लेख 'ओबामा प्रेसीडेंसी एण्ड सम क्वेश्चन मार्क्स' में दिये गये हैं।
असल में ओबामा ने बड़ी चालाकी से अपने आपको अश्वेत आंदोलन की विरासत से जोड़ लिया। उन्होंने अपने मुसलमान होने का भी फायदा अपनी छवि बनाने में उठाया। उनके हालिया बयान या विदेश नीति में नरम रूख उनकी प्रगतिशीलता की नहीं अमेरिका के संकट में पड़े पूंजीपति वर्ग की मजबूरी है। दुनिया को ओबामा को उनके असली चेहरे के साथ समझना चाहिए न कि बनाई जा रही और पेश की जा रही छवि के आधार पर।
असल में ओबामा ने बड़ी चालाकी से अपने आपको अश्वेत आंदोलन की विरासत से जोड़ लिया। उन्होंने अपने मुसलमान होने का भी फायदा अपनी छवि बनाने में उठाया। उनके हालिया बयान या विदेश नीति में नरम रूख उनकी प्रगतिशीलता की नहीं अमेरिका के संकट में पड़े पूंजीपति वर्ग की मजबूरी है। दुनिया को ओबामा को उनके असली चेहरे के साथ समझना चाहिए न कि बनाई जा रही और पेश की जा रही छवि के आधार पर।
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